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April 27, 2017

Nala Ponnappa's cartoon I am a Chicken Rakshak

Nala Ponnappa

India:Hartosh Singh Bal Interviews D.N. Jha regarding his book 'Rethinking Hindu Identity' (2009)


Open Magazine, 20 June 2009

Bible on Hinduism (Hartosh Singh Bal)

Hinduism as we know it was a British creation. DN Jha reveals a few home truths

Rethinking Hindu Identity | DN Jha | Equinox | 100 pages | £14.99

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When you say Hinduism is the youngest of religions, do you mean this literally?

A There may be a few sects younger than Hinduism, but it is certainly one of the youngest religions. The word Hindu in the sense of a religion does not exist in Sanskrit texts prior to the 19th century. Given this fact, how do we accept the view that Hinduism is an eternal religion? It cannot be treated as eternal or sanatana—the Sanskrit term for eternal. There is no basis for this in history. Interestingly, even the expression Sanatan Dharma was first used in the Buddhist texts Suttanipata and Dhammapada. The former defines it as truth being an undying word and the latter as love alone being an antidote to hatred and enmities. Subsequently, the Brahminical texts used it in different senses and in various texts and contexts.

Hinduism itself is a colonial construct: when the British commenced the Census, they faced the problem of classifying amorphous groups of castes and communities, and people of different religious denominations. The Census authorities used the term Hindu to bring all non-Muslims under one category. But the line between Hindus and others was so unclear that the term ‘Hindu Mohammedans’ was used in some Census records as late as 1911.

The 19th century social reformers also accepted this term, which is why it became so popular. The first Indian to do so was Rammohan Roy. In the early 20th century, the University of Calcutta started two departments of history: one for the study of ancient Indian history and the other for promoting the study of Islamic history. Though, in practice, the former glorified the ‘Hindu’ period of Indian history and the latter denigrated Muslim rule. RC Majumdar and Jadunath Sarkar—no doubt great historians of modern times—were the products of the academic milieu in which celebration of Hindu kings and condemnation of Muslim rulers went hand in hand. This milieu has unfortunately continued in most Indian universities.

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http://www.openthemagazine.com/article/books/a-bible-on-hinduism

India: Employers (public or private) should have no business asking personal information on citizen's caste or religion; Emplyess should refuse to give such data

Give us your religion, caste, Aadhaar: HRD to all college teachers

. . . the Ministry of Human Resource Development has, over the last four months, profiled at least 60 per cent of more than 15 lakh university and college teachers, complete with individual details such as religion, caste, Aadhaar and phone numbers.

Teachers who are yet to furnish personal details have another month to comply. Moves are also afoot to create a similar students’ database next year.

http://indianexpress.com/article/education/give-us-your-religion-caste-aadhaar-hrd-to-all-college-teachers-fake-teachers-4629813/

Hindi Article; Kashmir: Need For Dialogues


भारत की कश्मीर नीतिः आगे का रास्ता -राम पुनियानी कश्मीर घाटी में अशांति और हिंसा, जिसने बुरहान वानी की जुलाई 2016 में मुठभेड़ में हत्या के बाद से और गंभीर रूप ले लिया है, में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। बल्कि हालात और खराब होते जा रहे हैं। अप्रैल 2017 में हुए उपचुनावों में बहुत कम मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान का प्रतिशत सात के आसपास था। इन उपचुनावों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए। हम सबने देखा कि किस तरह एक कश्मीरी युवक को सेना की गाड़ी से बांध दिया गया ताकि पत्थरबाज, गाड़ी पर पत्थर न फेंके। यह घटना दिल दहला देने वाली थी। घाटी में पत्थरबाजी में कोई कमी नहीं आ रही है। पत्थर फेंकने वाले युवाओं को लोग अलग-अलग दृष्टिकोणों से देख रहे हैं। शेख अब्दुल्ला ने चुनाव की पूर्व संध्या पर कहा कि पत्थर फेंकने वाले अपने देश की खातिर ऐसा कर रहे हैं। उनके इस बयान की कटु निंदा हुई। कुछ लोगों ने इसे केवल एक चुनाव जुमला निरूपित किया। मीडिया के एक तबके का कहना है कि पत्थर फेंकने वाले पाकिस्तान समर्थक हैं और हमारे पड़ोसी देश के भड़काने पर ऐसा कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। कश्मीर में पत्थरबाजी का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है परंतु हाल के कुछ महीनों में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धि हुई है। युवा दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक ओर हैं आतंकवादी और अतिवादी और दूसरी ओर, सुरक्षाबल। दोनों ही उन्हें डरा धमका रहे हैं और उनके खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। यह साफ है कि जब भी दमनचक्र तेज़ होता है तब पत्थरबाजी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। मकबूल भट्ट को 1984 में फांसी दिए जाने के बाद, अफज़ल गुरू को 2013 में मृत्युदंड दिए जाने के बाद और अब बुरहान वानी की मौत के बाद इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है। ये लड़के कौन हैं जो पत्थर फेंकते हैं? क्या वे पाकिस्तान से प्रेरित और उसके द्वारा प्रायोजित हैं? सुरक्षा बलों की कार्यवाहियों में घाटी में सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं, हज़ारों घायल हुए हैं और कई अपनी दृष्टि गंवा बैठे हैं। मीडिया का एक हिस्सा चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि पत्थरबाजी के पीछे पाकिस्तान है और वही पत्थरबाजों को धन दे रहा है। जो प्रश्न हमें अपने आप से पूछना चाहिए वह यह है कि क्या कोई भी युवा, किसी के भड़काने पर या धन के लिए अपनी जान दांव पर लगा देगा। क्या वह अपनी आंखें खो देने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा मोल लेगा? पत्थरबाजों में से अनेक किशोरवय के हैं और आईटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं। परंतु वे घृणा से इतने लबरेज़ हैं कि वे अपनी जान और अपने भविष्य को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे कितने अधिक कुंठित हैं। मीडिया के एक छोटे से तबके ने इस मुद्दे की गहराई में जाकर पत्थरबाजों से बातचीत की। उन्होंने जो कुछ कहा उससे कश्मीर घाटी में कानून और व्यवस्था की स्थिति के बारे में हमारी सोच को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता है। इनमें से कई ऐसे परिवारों से हैं, जिन्हें अब जिंदगी से कोई उम्मीद बाकी नहीं है। उन्होंने शारीरिक प्रताड़ना झेली है, उन्हें हर तरह से अपमानित किया गया है और उनके साथ मारपीट आम है। उनके लिए पत्थर फेंकना एक तरह से कुंठाओं से मुक्त होने का प्रयास है। उनमें से कुछ निश्चित तौर पर पाकिस्तान समर्थक हो सकते हैं परंतु मूल मुद्दा यही है कि घाटी के युवाओं में गहन असंतोष और अलगाव का भाव घर कर गया है और इसका कारण है वह पीड़ा और यंत्रणा, जो उनके क्षेत्र में लंबे समय से सेना की मौजूदगी के कारण उन्हें झेलनी पड़ रही है। बुरहान वानी की हत्या के बाद, पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस, दोनों को ही यह अहसास हो गया था कि वहां स्थितियां बिगड़ सकती हैं। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, असंतुष्टों के साथ बातचीत करना चाहती थीं परंतु सरकार में उनकी गठबंधन साथी भाजपा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महबूबा मुफ्ती का मानना है कि केवल बातचीत से ही समस्या का हल निकल सकता है। इसके विपरीत, भाजपा, गोलाबारूद और सेना की मदद से असंतोष को कुचल देना चाहती है। ऐसे समय में हमें घाटी में शांति स्थापना के पूर्व के प्रयासों को याद करना चाहिए। यूपीए-2 ने वार्ताकारों के एक दल को कश्मीर भेजकर समस्या का अध्ययन करने और उसका हल सुझाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस दल में कई प्रतिष्ठित नागरिक शामिल थे। दल ने सुझाव दिया था कि कश्मीर विधानसभा की स्वायत्तता बहाल की जाए, जिसका प्रावधान कश्मीर की विलय की संधि में था। दल ने यह सुझाव भी दिया था कि असंतुष्टों के साथ बातचीत के रास्ते खोले जाएं, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द किया जाए और पाकिस्तान के साथ चर्चा हो। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम विलय की संधि की शर्तों को याद करें और वार्ताकारों की सिफारिशों को गंभीरता से लें। कश्मीर के भारत में विलय के 70 साल बाद भी हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय राष्ट्र निर्माताओं का कभी यह इरादा नहीं था कि कश्मीर का भारत में जबरदस्ती विलय करवाया जाए या वहां व्याप्त असंतोष को सेना के बूटों तले कुचला जाए। भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए कहा थाः ‘‘कुछ लोग यह मानते हैं कि हर मुस्लिम-बहुल इलाके को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। वे यह पूछते हैं कि हमने कश्मीर को भारत का भाग बनाने का निर्णय क्यों लिया है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रहेंगे...हम कश्मीरीयों को दगा नहीं देंगे’’ (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)। कश्मीर में स्थिति अत्यंत गंभीर है और केन्द्र सरकार के मनमानीपूर्ण व्यवहार के कारण दिन प्रतिदिन और गंभीर होती जा रही है। अगर हम स्वर्ग जैसी इस भूमि पर शांति चाहते हैं तो हमें महबूबा मुफ्ती और शेख अब्दुल्ला जैसे व्यक्तियों के विचारों का भी सम्मान करना होगा। स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है जब हम लोगों के दिलों को जीतें। अति-राष्ट्रवादी फार्मूलों से काम नहीं चलेगा। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

Connecting the dots: The BJP, Hindutva and fringe organisations (Book Review) IANS April 26, 2017

Connecting the dots: The BJP, Hindutva and fringe organisations (Book Review)

IANS April 26, 2017

Title: Shadow Armies: Fringe Organisations and Foot Soldiers of Hindutva; Author: Dhirendra K. Jha; Publisher: Juggernaut; Pages: 228; Price: Rs 499

The rise of the Bharatiya Janata Party (BJP) from two seats in 1984 to a staggering 282 in 2014 may be seen as the growing appeal of its ideology -- Hindutva -- among the masses, but this compelling work of extraordinary research provides enough evidence to suggest that the ruling party's advance over the last three decades is not its journey alone and has been accompanied by the steady progress of fringe organisations which, in turn, have been the "foot soldiers" of its ideology.

From Yogi Adityanath's Hindu Yuva Vahini in eastern Uttar Pradesh and the "love jihad" obsessed Sri Ram Sene in Mangalore to the Sanatan Sanstha, whose members have been arrested for the murder of rational thinkers Narendra Dabholkar, Govind Pansare and M.M. Kalburgi, the direct outcome of the activities of almost all of these eight organisations -- polarisation -- has not only served to foster a pro-Hindutva environment but has, indeed, brought about long-term electoral gains for the BJP.

It is perhaps the first book of its kind that has carefully studied the functioning and evolution of fringe organisations in the country and linked, with evidence, their connection to a mainstream political party.

Author Dhirendra K. Jha, a journalist, combines substantial research of eight Hindu rightwing organisations across India and their BJP connections with flawless prose to prove his point in "Shadow Armies: Fringe Organisations and Foot Soldiers of Hindutva".

Jha asserts that India has witnessed "astonishing growth in the politics of Hindutva" and, by providing careful insights into the structures as well as the evolution of such organisations, claims that there is a common connection between all such forces.

The Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) is the vanguard of this ideology and, according to the book, all these organisations, directly or indirectly, function under the guidance of the RSS to ensure that one particular community, the Hindus, have the exclusive right to define our national identity.

But, some may argue, the BJP is the only RSS outfit given to politics and the RSS does not necessarily claim to be the vanguard of all such Hindutva forces.

The author narrates numerous anecdotes and examples to convey, quite clearly, to his readers that in practice most of its affiliates work as "political instruments" to convert India into a Hindu Rashtra. Their purpose and intentions are achieved in the name of protecting Hinduism, which ultimately swings electoral gains in favour of the BJP.

"Though the RSS publicly eschews politics, as the parent body it not only supplies much of the strategic and ideological direction as well as cadres and leaders to the BJP and other associates, but also has its hand -- directly or through its affiliates -- in several communal conflagrations. It is these attacks on minorities that lead to the kind of polarisation necessary for the growth of Hindutva politics," Jha says bluntly in the introduction.

The author is struck by the "omnipresence" of these pan-Indian outfits and finds that their divisive agenda is carried out in a highly "equivocal" manner.

"Whenever these other bodies create a controversy, the RSS and the BJP promptly label them 'fringe organisations'. The fact, however, is that they are active parts of the Sangh Parivar, working as buffer organisations for doing the dirty work the BJP and the RSS were once obliged to do themselves," Jha maintains.

Jha argues that the RSS and the VHP are the biggest "shadow organisations" of the BJP and that except for contesting elections, they do almost everything that a mainstream political party would do -- mobilise masses, develop issues for political polarisation, and play a role in identifying electoral candidates and managing booth-level campaigns.

The findings of the book suggest that a central focus of all of the eight organisations revolves around the portrayal of Muslims as a threat to Hindus. Though the practitioners would never say this in public, Jha claims, the objective of these activities is always to create false fear among Hindus and stoke the polarisation of their votes in favour of the party leading the forces of Hindutva.

The eight fringe organisations that figure in the book are Sanatan Sanstha, Hindu Yuva Vahini, Bajrang Dal, Sri Ram Sene, Hindu Aika Vedi, Abhinav Bharat, Bhonsala Military School and Rashtriya Sikh Sangat. The author has, obviously, researched and compared, wherever necessary, the functioning of these bodies with the RSS and the VHP.

"Shadow Armies" is a scholarly offering and a result of research that attempts to unravel what has generally escaped both the imagination and research of leading writers. Jha's book will stay relevant as long as the fringe organisations continue to stir controversies and may well be regarded as an apt contemporary investigation into the Hindutva brigade.

(This review is based on an advance copy received from Juggernaut. The book is available in stores from April 26, 2017. Saket Suman can be contacted at saket.s@ians.in)

--IANS

ss/vm/sac

(This story has not been edited by Business Standard staff and is auto-generated from a syndicated feed.)

source URL: http://www.business-standard.com/article/news-ians/connecting-the-dots-the-bjp-hindutva-and-fringe-organisations-book-review-117042600284_1.html

April 26, 2017

En Inde aussi, l’extrême droite est en finale [In India too the Extreme Right is in the Final] (Guillaume Delacroix)

Mediapart.fr - 26 avril 2017

En Inde aussi, l’extrême droite est en finale

Par Guillaume Delacroix Blog : MAXIMUM INDIA

Les parlementaires indiens sont appelés à élire le président de la plus grande démocratie du monde au mois de juillet. Le favori est Mohan Bhagwat, chef du mouvement RSS, incarnation de l’idéologie nationaliste hindoue dans le sous-continent.

En Inde aussi, la bataille présidentielle fait rage. Le 26 juillet prochain, Pranab Mukherjee cèdera la place à son successeur à Rashtrapati Bhavan, le palais trois fois plus grand que la cité du Vatican, où le chef de l’Etat dispose de 340 pièces au milieu d’un parc de 13 hectares, en plein coeur de Delhi. Comme en France, les spéculations vont bon train, à mesure que l’échéance du quinquennat approche. Difficile, à ce stade, de ne pas faire de comparaison avec le duel qui oppose Emmanuel Macron à Marine Le Pen pour le second tour de l’élection présidentielle française.

Ce sont en effet les représentants du centre gauche et de la droite extrême qui fourbissent actuellement leurs armes. Sauf qu’ici, c’est le second qui est favori. Son nom? Mohan Bhagwat. Agé de 66 ans, il dirige le Rashtriya Swayamsevak Sangh (Corps des volontaires nationaux, RSS), un mouvement idéologique qui forme la jeunesse en bermuda kaki, en lui inculquant la supériorité de la nation indienne et de la religion hindoue sur tout le reste. Cette organisation a pour vitrine politique le Bharatiya Janata Party (Parti du peuple indien, BJP) du premier ministre, Narendra Modi.

En face, tous les partis opposés aux gouvernants actuels sont en état de sidération. La vague safran qui déferle sur l’Inde, scrutin après scrutin, a été encore plus forte en mars, avec une victoire éclatante des nationalistes, en Uttar Pradesh notamment. Pour tenter de l’endiguer, le Parti du Congrès (centre gauche), le Parti communiste marxiste et les principales formations régionales de teinte socialiste - le Janata Dal (United) party de Nitish Kumar au Bihar, le Samajwadi Party d’Akhilesh Yadav et le Bahujan Samaj Party de Mayawati en Uttar Pradesh pour n’en citer que trois - s’en remettent à Sonia Gandhi pour dénicher un candidat qui satisfasse tout le monde.

Mohan Bhagwat contre Sonia Gandhi, quelle affiche ! L’Inde n’est pas très rompue à la dictature des sondages, contrairement à la France, mais il suffit de s’en remettre à l’arithmétique pour comprendre rapidement pourquoi le premier, qui fut à l’origine du fan-club de Modi lorsque celui-ci n’était encore que ministre en chef du Gujarat, a de très grandes chances de gagner.

Le régime politique indien étant parlementaire, l’élection du président s’opère au moyen d’un scrutin indirect passablement alambiqué. Ce sont les 776 députés et sénateurs fédéraux, ainsi que les 4120 parlementaires des vingt-neuf Etats fédérés, qui constituent le collège électoral. Les uns et les autres disposent d’un nombre de voix qui varie en fonction de la population qu’ils représentent dans leurs institutions respectives, sur la base du recensement de 1971.

Cela représente 1 098 882 voix. Pour être élu président de l’Inde, il faut donc rassembler sur son nom 549 442 voix (50% + une voix). Etant donné les victoires à répétition du BJP et de ses alliés depuis 2014, la droite nationaliste en contrôle aujourd’hui 532 000, soit 48,4% du total. Autant dire que c’est elle qui choisira le successeur de Pranab Mukherjee.

Que ceux qui s’en émeuvent se rassurent : en Inde, le président ne sert pas à grand chose. Qui sait, en France, que l’actuel locataire de Rashtrapati Bhavan a sa carte au Parti du Congrès, opposant numéro un au BJP de Narendra Modi ? Et qui sait qu’avant lui, c’était une femme qui occupait la fonction, Pratibha Patil, elle aussi du Parti du Congrès ? Détail qui a son importance, Pranab Mukherjee a la possibilité de se représenter, si Sonia Gandhi ne trouvait personne. Voilà une différence majeure avec la France, où l’on sait au moins une chose : en mai, François Hollande quittera définitivement l’Elysée.



Wohin geht Indien? Rolf Bauer's Comment in Austrian Newspaper Wiener Zeitung

Wiener Zeitung 26 April 2017

Wohin geht Indien?


Von Rolf Bauer

Unter Premier Narendra Modi wandelt sich die größte Demokratie der Welt Schritt für Schritt zu einem autoritären Staat - das erhöht auch die Gefahr eines Atomkrieges mit Pakistan.


Formen des autoritären Nationalismus sind weltweit wieder im Trend. Während US-Präsident Donald Trump täglich in den Schlagzeilen ist, finden ähnlich beunruhigende Entwicklungen in anderen Teilen der Welt kaum mediale Aufmerksamkeit. Etwa die Transformation der indischen Demokratie durch einen radikalen Hindu-Nationalismus, der zunehmend autoritäre Züge annimmt.

Dabei gibt es viele Gründe, Indiens jüngste politische Entwicklungen genau zu beobachten: Es ist bevölkerungsmäßig der zweitgrößte Staat der Erde, die größte Demokratie (noch!), die viertgrößte Wirtschaftsmacht und nicht zuletzt - und das ist besonders beunruhigend - seit Jahrzehnten im Clinch mit dem Nachbarstaat Pakistan. Sowohl Indien als auch Pakistan sind Atommächte. Das Eskalationspotenzial ist hoch und seit dem Amtsantritt von Premier Narendra Modi noch zusätzlich gestiegen. Modi gehört der Bharatiya Janata Party (BJP) an, einer hindu-nationalistischen Partei, die Indien Schritt für Schritt zu einem autoritären Staat umwandelt - diese Entwicklung erhöht die Gefahr eines Atomkrieges zwischen den beiden Nachbarn.

Rechtsradikale Hindus im Aufwind

Diese Entwicklung lässt sich auch am Erstarken radikaler Studentenverbindungen an den Universitäten ablesen. Die Hochschülerschaft der University of Delhi wird seit September 2016 von der Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) kontrolliert. Ihre Politik lässt sich kurz zusammenfassen: Jede Kritik an der Regierung wird gewaltsam im Keim erstickt. Wer sich auf dem Campus öffentlich zu heiklen Themen wie dem Kaschmir-Konflikt äußert, muss damit rechnen, von Schlägertrupps der ABVP attackiert zu werden. Die vergangenen Wochen waren von gewalttätigen ABVP-Aktionen geprägt.

Die ABVP-Anhänger übernehmen sowohl die Ideologie als auch die politischen Strategien ihrer Mutterorganisation, der Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), einer rechtsradikalen Kaderorganisation, die fünf bis sechs Millionen Mitglieder zählt. Ihrem Selbstverständnis nach ist die RSS die Bewahrerin und Retterin der hinduistischen Gesellschaft Indiens. Minderheiten, allen voran Muslime, wären für die Probleme des Landes verantwortlich, behauptet sie. Ihre einfache Lösung: Hindutva, eine komplette Hinduisierung Indiens. Ihre Gewaltbereitschaft stellen die Mitglieder der RSS regelmäßig unter Beweis. Viele werden paramilitärisch ausgebildet, was sie besonders gefährlich macht.

Strategische Attacken gegen Nicht-Hindus

Oft als spontane Gewaltausbrüche eines wütenden Mobs dargestellt, handelt es sich bei den RSS-Attacken meist um strategisch und gezielt durchgeführte Aktionen. Traurige Berühmtheit erlangten die Ausschreitungen im Bundesstaat Gujarat im Jahr 2002, die auch als "Gujarat-Pogrom" bezeichnet werden. Führungspersonen der RSS waren damals wesentlich an der Orchestrierung von Gewaltakten gegen Muslime beteiligt. Bei diesen Ausschreitungen wurden selbst Kinder vergewaltigt und bei lebendigem Leibe verbrannt. Paul R. Brass, ein renommierter Südasienkundler, hat den militanten Flügel des RSS sogar mit der berüchtigten Sturmabteilung (SA) der Nationalsozialisten verglichen. Aktuell sorgt ein RSS-Führer für Aufsehen, weil er ein Kopfgeld auf den Chief Minister des Bundesstaats Kerala ausgesetzt hat, nachdem dieser sich öffentlich kritisch über die RSS geäußert hatte.

Auch Indiens Premier Modi ist Mitglied der RSS, seine Partei BJP ist ihr politischer Flügel. Und seit Modi regiert, erfährt auch die ABVP Aufwind. In den vergangenen Jahren konnte sie ihre Mitgliederzahl auf mehr als drei Millionen erhöhen, was sie zur stärksten politischen Kraft unter Indiens Jugend macht. An 18 Universitäten hält sie die Mehrheit innerhalb der Hochschülerschaft, Tendenz steigend. Wo sie regiert, wird das Leben für kritische Lehrende und Studierende immer schwieriger.

Auslöser für die jüngsten Ausschreitungen an der University of Delhi war ein Seminar zum Thema "Kulturen des Protests", das vom Ramjas College der Universität organisiert worden war. Geplant war unter anderem ein Vortrag über die Menschenrechtsverletzungen gegen die Adivasi, eine indigene Minderheit in Indien. Dass es sich bei dem Referenten um Umar Khalid handelte, war ein zusätzlicher Grund für die ABVP, die Veranstaltung gewaltsam zu beenden. Khalid forscht an der Jawaharlal Nehru University, einer Bastion linker Intellektueller, und gilt als Sprachrohr kritischer Studierender. Die Teilnehmer des Seminars wurden von Anhängern der ABVP mit Steinen beworfen und im Seminarraum eingeschlossen, bis die Universität die Veranstaltung offiziell für beendet erklärte.

Polizei schaut bei Angriffen zu oder macht sogar mit

Als Reaktion auf die Einschüchterungsversuche der ABVP formierte sich ein Protest am Nordcampus der Universität, an dem sowohl Studierende als auch Lehrende teilnahmen. Die anwesende Polizei intervenierte nicht, als die Demonstranten brutal von ABVP Anhängern attackiert wurde. Im Gegenteil. Als der Protestzug vor der nächsten Polizeistation hielt, um Anzeigen gegen die ABVP zu erstatten, wurden Demonstranten und Journalisten von Polizeikräften geschlagen und festgenommen. Der lokalen Polizei wird nun vorgeworfen, mit der ABVP kooperiert zu haben.